यूटी की मांग के पीछे एक बड़ी दलील ये दी जाती है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने विकास का पैसा लद्दाख में ख़र्च नहीं किया, इसलिए वह विकास में
पिछड़ गया.
हालांकि स्थानीय पत्रकार सेवांग रिंगज़िन कहते हैं कि
नब्बे के दशक में स्वायत्त हिल काउंसिल की व्यवस्था आ जाने के बाद
लेह-लद्दाख में विकास को गति मिली है.
कालीन की तह लगाता हुआ वह कश्मीरी दुकानदार भी यह मानने को तैयार नहीं हुआ कि बीते एक दशक में लेह विकास से वंचित रहा है.
उन्होंने
कहा, "मुख्य बात यही थी कि यहां के लोग ये चाहते हैं कि उनके ऊपर कोई न
हो. ये लोग भी स्वायत्तता चाहते थे. जम्मू कश्मीर विधानसभा की ओर से फंड के
भेदभाव की बात सही हो सकती है लेकिन वो एक राजनीतिक मसला है. मैं कह रहा हूं कि यहां की सरकारी नौकरियों के लिए अब बाहर के लोग आवेदन करेंगे तो ये
लोग उनका मुक़ाबला नहीं कर पाएंगे क्योंकि उन्हें शिक्षा और कौशल की वैसी
सुविधाएं नहीं मिली हैं."
गृह मंत्री अमित शाह की ओर से सूचित किए गए फ़ैसले पर लेह के मुख्य बाज़ार की सड़क पर दो बिल्कुल उलट मत और भावनाएं पसरी हुई हैं.
किसी
दुकान में जो विदेशियों को कालीन दिखा रहा है, वह नाराज़ है. जो बिल बना
रहा है वो प्रसन्न है. लेकिन किसी ने नहीं कहा कि इस मतभेद ने अब तक किसी
संघर्ष को जन्म दिया हो.
एक कश्मीरी नौजवान से पूछा तो उसने तुरंत अपना मोबाइल फोन निकालकर वे तस्वीरें दिखाईं कि कैसे इस बार वो ईद पर अपने
घर नहीं जा सका तो उसके बौद्ध मालिक ने उसके साथ बैठकर ईद मनाई.
लेकिन क्या यह घटना यहां की कारोबारी ज़रूरत की उपज है या यहां के समाज का असल प्रतिबिंब है?
कुछ लोग मुस्कुराकर रह गए, कुछ ने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया.
लेह बाज़ार की एक दुकान पर बैठे आंगचुक कहते हैं कि वे कश्मीरियों के
चेहरे पर उदासी साफ़ देख सकते हैं और उन्हें यह दृश्य अच्छा नहीं लगता.
उन्होंने कहा, "जो भी हो, सत्तर साल तक हमने एक प्रदेश साझा किया है. ये कश्मीरी भी लेह बाज़ार का हिस्सा हैं."
कम से कम इस सड़क पर यह दो परस्पर विरोधी विचारों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की तरह लगता है.
एक
दुकान के बौद्ध मालिक ने कहा कि वो अपने कश्मीरी कारीगरों को कभी यहां से नहीं जाने देना चाहते, भले ही वह उनके विचारों से सहमत नहीं हैं.
एक दुकान पर दो कश्मीरी कामगारों से कश्मीर के हालात पर पूछा तो उन्होंने सबसे पहली नाराज़गी वहां लगी पाबंदियों पर जताई और दूसरी भारतीय
मीडिया पर.
वे बताने लगे कि उन्हें ये दिन अपने मां-बाप और भाई-बहनों की फ़िक्र में काटने पड़े हैं.
ख़ुद
को 'देशभक्त भारतीय' बताने वाले एक मुखर कश्मीरी दुकानदार ने कहा कि वह
कश्मीर की आज़ादी की कोशिशों के समर्थक नहीं है लेकिन कश्मीरियों का ख़ास
अधिकार छीन लिए जाने से उन्हें धक्का लगा है.
उन्होंने कहा, "हमारा
एक प्रदेश था, उसे आपने यूटी बना दिया सिर्फ़ इसलिए कि इससे आप चुनाव जीतें तो यह सिर्फ़ एक राजनीतिक फ़ैसला है."
यहां के कश्मीरी दुकानदार ये स्वीकारने में हिचकते नहीं कि बौद्ध
मालिकों से अच्छे संबंध अपनी जगह हैं, लेकिन अनुच्छेद 370 पर उनकी भावनाएं
कश्मीर के साथ हैं, लेह के साथ नहीं.
एक दुकानदार ने कहा, "अगर आप
चाहते हैं कश्मीर आपका अपना बने तो कश्मीरियों में ये भाव पैदा करने पर
ज़ोर दो कि वे भारतीय हैं और आपके भाई हैं. "
"ऐसा मत करो कि उन्हें लगे कि आप उन्हें चिढ़ा रहे हो. उनका एक विशेष दर्ज़ा था जो आपने छीन लिया. "
मुझे एक गर्म कहवा पकड़ाते हुए उसने कहा, "अगर मैं आपसे आपका घर छीन लूं तो आप मुझसे झगड़ा नहीं करोगे? "
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