Tuesday, December 11, 2018

هل منعت مصر بيع السترات الصفراء بعد مظاهرات فرنسا؟

كما أعلن نشطاء وحقوقيون مصريون القبض على محام أمس الاثنين بعد كتابته نصا على فيسبوك يسخر فيه من أنباء تحدثت عن منع أصحاب المتاجر من بيع السترات الصفراء للمواطنين، خوفا من اندلاع مظاهرات مشابهة لتلك التي تشهدها فرنسا.
وألقي القبض على المحامي الحقوقي محمد رمضان في مدينة الإسكندرية. وتقول السلطات إنها عثرت على خمس سترات صفراء بحوزته، وفقا لمحاميه.
وبحسب المحامي، عبد الرحمن الجوهري، فإن رمضان يواجه اتهامات من بينها التحريض على التظاهر وتكدير السلم العام، وإساءة استخدام وسائل التواصل الاجتماعي.
وكانت تقارير صحفية أشارت إلى أن السلطات طالبت التجار بعدم بيع السترات للأفراد إلا بعد حصولهم على موافقة أمنية.
وتفاعل نشطاء على تويتر وفيسبوك مع الخبر بنوع من السخرية، إذ رأوا في القرار مؤشرا على خوف السلطات من انتقال عدوى احتجاجات فرنسا إلى مصر.
ودعا آخرون إلى الاقتياد بالمتظاهرين في فرنسا لاستكمال ثورة يناير، على حد قولهم.
وكتب صاحب حساب @ : "مصر تحظر بيع السترات الصفراء قبل عدة أسابيع من ذكرى ثورة ٢٥ يناير لعدم تكرار السيناريو الفرنسي والمطالبة برحيل السيسي".
في المقابل، انتقد مغردون الدعوات للتظاهر واصفين ما يحدث في فرنسا بالخراب.
وغردت إحداهن: "... ما حدث فى فرنسا .. حدث بنفس الشكل ونفس الأسلوب فى مصر فى ثورة يناير لقد تم استغلال #السترات_الصفر ليتم حرق .. وسرق .. و ..فى ناس تلعب لصنع ثورة فى فرنسا ...ويبدو أن حركة "السترات الصفراء" الفرنسية ألهمت نشطاء في دول أخرى وتحولت إلى رمز للتظاهر على غلاء الأسعار.
ففي الأردن أطلق مغردون شعار "الشماغات الحمر" على احتجاجاتهم التي انطلقت قبل أيام للمطالبة بإسقاط قانون الضريبة.
كما دشن نشطاء تونسيون حملة "السترات الحمراء" احتجاجا على ارتفاع تكاليف المعيشة وتدني القدرة الشرائية ودعوا إلى النزول إلى الشوارع في غرة شهر يناير/كانون الثاني القادم.
وظهرت السترات الصفراء الأسبوع الماضي في مدينة البصرة العراقية مع تجدد الاحتجاجات على تردي مستوى الخدمات.
جاء ذلك في مقابلة أجراها المغامسي على قناة روتانا خليجية، حيث قال: "ثمة أمور حصلت مؤخرا في السنين التي سلفت كانت تريد تفكيك العالم الإسلامي نجحت هذه الأمور في بعض هذه الدول، استعصت هذه البلاد قيادة وعلماء وشعبا على تلك الحقبة أو على تلك السهام، الدول كالبني آدم تشيخ وتكبر، فطن الملك سلمان لهذا الأمر، فلما آل الملك إليه بعد حين من تثبيت قواعد البلاد وإعادة تشكيل مجلس الوزراء عهد بولاية العهد للأمير محمد بن سلمان.."
وأضاف: "لما تولى الأمير محمد بن سلمان ولاية العهد خطت الدولة خطوات أسرع بكثير مما تخطوه الدول القرينة لها، وظهر اسم سمو الأمير عالميا ملفتا بشكل لا يمكن أن يتوقعه أحد، بمعنى أن ما كانت تخطوه الدولة في سنين أصبح يخطئ في شهور أو في أيام هذا الأمر جعل البلاد والأمير نفسه نصب أعين لا تريد بالبلاد خيرا، فأصبح ثمة مؤامرات تحاك بالسر وتحاك بالعلن.."
وتابع قائلا: "أحيانا تحصل أمور.. أحيانا قد تحدث علة غير مقصودة لكنها تنبيك عن أشياء كثر وهذا الذي حصل في الآونة الأخيرة في القضية الأخيرة، فالذي حصل أن الدول تواطأت وتواطأت جماعات وتواطئ إعلام وصحف على محاولة إسقاط الدولة ومحاولة التقليل من شأن الأمير وهيبته، نجاه الله عز وجل بأمرين، الأمر الأول هو رباطة جأشه وهذا كان ظاهرا جليا لأنه يعرف من نفسه بأنه برئ مما قال فيه براءة الشمس من اللمس، كانت القوى تحرص على ألا يكون له ظهور وأن ينيب أحدا في قمة العشرين التي تجمع قادة العالم فإذا بالأمير يذهب بنفسه ولم يكتفي بهذا ولكن قبل أن يذهب إلى قمة العشرين مر في جولة على الدول العربية ثم عاد بعد قمة العشرين مرفوع الرأس مرفوع الهامة والبلد تبع له وأكمل ما قام به في المرة الأولى بزيارة بعض الدول العربية.."
أما الأمر الثاني فقال المغامسي أنه قد يكون "ثمة شيء بينه وبين الله، فإن الحفظ من الله عز وجل يكون بأسباب أرضية وأسباب سماوية.."أن ينيب أحدا في قمكة العشرين

Tuesday, November 27, 2018

ما علاقة الدوارات التي تشتهر بها طرق عمان بأسبوع دبي للتصميم

حمل أسبوع دبي للتصميم عدداً من الأفكار الملهمة والخلابة، كما احتضن أيضاً جزءاً من الثقافات العربية المختلفة التي قرر مصممون شباب تجسيدها في تصميماتهم فكيف جسدت الأردن في أسبوع دبي للتصميم؟
كثيراً ما تصادفنا قصص نساء تعرضن للتحرش في الشارع، أو حتى مررن بمواقف كانت قد تسببت بشعورهن بالإحباط والضعف. وهكذا، قررت شابة مصرية أن تقدم يد العون لهن.. ولكن بطريقتها الخاصة.
كشف فريق علماء آثار يوناني لأول مرة عن بقايا مدينة كانت ضائعة في أحد الأيام، يُعتقد أنها أسست على يد أسرى حرب طروادة السابقين في القرن الـ12 أو الـ13 قبل الميلاد.
يخطط الفنان الأمريكي رون إنغليش لإتلاف لوحة من عمل الفنان الإنجليزي بانكسي، كان قد اشتراها مقابل 730 ألف دولار، احتجاجاً على سوق فنون الشارع.
رغم أنها مهجورة لحوالي 20 عاماً.. تستضيف مدينة “بيراميدن” الروسية، حفلاً موسيقياً فريداً من نوعه. فما الذي تعرفه عن مدينة “الأشباح” هذه؟
دبي، الإمارات العربية المتحدة ( ) – رغم أن قلادتها قُدرت ما قبل البيع بمبلغ يتراوح بين المليون والمليونين دولار، إلا أن ثمن قلادة ملكة فرنسا، ماري أنطوانيت، وصل إلى أكثر من 36 مليون دولار.
ويُشار إلى أن القلادة هي جزء من مجموعة فاخرة تضمنت دبوسا ألماسيا بيع بأكثر من 2.1 مليون دولار. بالإضافة إلى خاتم يتألف من خيوط منسوجة من شعر ملكة فرنسا، وكانت قيمته قد بلغت حوالي 440 ألف دولار.
وكانت هذه المجموعة جزءاً من مزاد أكبر يشمل قطعاً من عائلة بوربون بارما، وهي واحدة من أهم البيوت الحاكمة في أوروبا. ويُذكر أن هذه القطع، التي يصل مجموع عددها إلى مائة قطعة، قد جلبت عائدات تصل قيمتها إلى أكثر من 53 مليون دولار.
وذكر أنه في شهر مارس/آذار من العام 1791، وضعت المجوهرات في صندوق خشبي، وتم تهريبها من فرنسا إلى فيينا لحمايتها من التضرر خلال الثورة الفرنسية.
وتم الاحتفاظ بالمجموعة في العائلة لأكثر من 200 عام، ويُشار إلى أن هذه المجوهرات قد عُرضت لأول مرة في خريف هذا العام، ونُقلت إلى نيويورك ودبي ولندن وسنغافورة وتايبيه في جولة دولية قبل المزاد.
وأُقيم يوم الأربعاء مزاد علني في جنيف، سويسرا، عرضت فيه قلادة أنطوانيت، والذي وصفته دار "سوذبي" للمزادات بكونه واحدا من أهم المجوهرات الملكية على الإطلاق.
ويُشار إلى أن القلادة هي جزء من مجموعة فاخرة تضمنت دبوسا ألماسيا بيع بأكثر من 2.1 مليون دولار. بالإضافة إلى خاتم يتألف من خيوط منسوجة من شعر ملكة فرنسا، وكانت قيمته قد بلغت حوالي 440 ألف دولار.
وكانت هذه المجموعة جزءاً من مزاد أكبر يشمل قطعاً من عائلة بوربون بارما، وهي واحدة من أهم البيوت الحاكمة في أوروبا. ويُذكر أن هذه القطع، التي يصل مجموع عددها إلى مائة قطعة، قد جلبت عائدات تصل قيمتها إلى أكثر من 53 مليون دولار.
وذكر أنه في شهر مارس/آذار من العام 1791، وضعت المجوهرات في صندوق خشبي، وتم تهريبها من فرنسا إلى فيينا لحمايتها من التضرر خلال الثورة الفرنسية.
وتم الاحتفاظ بالمجموعة في العائلة لأكثر من 200 عام، ويُشار إلى أن هذه المجوهرات قد عُرضت لأول مرة في خريف هذا العام، ونُقلت إلى نيويورك ودبي ولندن وسنغافورة وتايبيه في جولة دولية قبل المزاد.
وكتبت دار "سوذبي" للمزادات عبر موقعها الرسمي على "تويتر" قائلة إن هذه القلادة سجلت رقماً قياسياً عالمياً لسعر اللؤلؤة.
دبي، الإمارات العربية المتحدة ( ) – رغم أن قلادتها قُدرت ما قبل البيع بمبلغ يتراوح بين المليون والمليونين دولار، إلا أن ثمن قلادة ملكة فرنسا، ماري أنطوانيت، وصل إلى أكثر من 36 مليون دولار.
وأُقيم يوم الأربعاء مزاد علني في جنيف، سويسرا، عرضت فيه قلادة أنطوانيت، والذي وصفته دار "سوذبي" للمزادات بكونه واحدا من أهم المجوهرات الملكية على الإطلاق.
وكتبت دار "سوذبي" للمزادات عبر موقعها الرسمي على "تويتر" قائلة إن هذه القلادة سجلت رقماً قياسياً عالمياً لسعر اللؤلؤة.

Monday, September 3, 2018

इन आठ तरीकों से बढ़ा सकते हैं दिमाग़ की क्षमता

आपके साथ कभी ऐसा हुआ है जब आप किसी का नाम या किसी जगह का नाम याद करने की कोशिश कर रहे हों और कुछ याद नहीं आ रहा हो.
ये कहा जाता है कि उम्र बढ़ने के साथ यादाश्त कम होने लगती है, ऐसा होता भी है लेकिन आप अपने दिमाग़ को तंदरुस्त रख सकते हैं.
अगर आप अपने दिमाग़ की क्षमता बढ़ाना चाहते हों तो निम्नांकित तरीकों को अपनाइए-
व्यायाम करने से दिमाग़ बेहतर होता है. व्यायाम करने से दिमाग की कोशिकाओं के बीच आपसी संपर्क बेहतर होता है और नई कोशिकाओं का निर्माण भी होता है.
कार्डियो वाले एक्सरसाइज करने से आप ज़्यादा आक्सीजन लेते हैं और अगर ये एक्सरसाइज आप आउटडोर कर रहे हों तो आपको विटामिन डी भी मिलता है.
आप ऐसा ही बदलाव दूसरों के साथ अपने आइडिया बांटते हुए महसूस कर सकते हैं. दूसरों की मदद करके महसूस कर सकते हैं.
अगर आपको कोई प्रजेंटेशन देना हो या स्पीच देनी हो तो उसकी तैयारी के लिए अपने नोट्स टहलते हुए या डांस करते हुए याद कीजिए, साफ़ अंतर दिखेगा.
आप जो भी सुगर और एनर्जी का इनटेक लेते हैं उसका 20 फ़ीसदी हिस्सा सीधा दिमाग़ को जाता है, यही वजह है कि दिमाग़ की कामकाजी हालत ग्लूकोज के स्तर पर निर्भर करती है.
अगर आपका सुगर लेवल नियंत्रित नहीं है तो फिर आपका दिमाग कंफ्यूज हो सकता है. ऐसे भोजन खाना दिमाग़ के लिए बेहतर हो सकता है जिसके डोपामाइन केमिकल निकलता है.
ये बात भी ख़्याल रखें कि दिमाग़ की कोशिकाएं फैट से बनती हैं, लिहाजा खाने में फैट का इस्तेमाल नहीं छोड़े. इसके अलावा नट्स, सीड्स, नाशपाती और मछली दिमाग़ के लिए बेहतर होते हैं.
तनाव दिमाग़ के लिए बेहतर होता है, क्योंकि आपातकाल में ही आपका दिमाग़ तेजी से सोचता है. लेकिन ज़्यादा समय तक तनाव का रहना दिमाग़ के लिए बेहतर नहीं होता है.
इसलिए समय समय पर दुनिया से एकदम कट जाना बेहतर होता है, दिमाग़ को आराम मिलता है.
हालांकि इस वक्त आप दिमाग़ के दूसरे हिस्से को काम पर लगा सकते हैं, ये वो हिस्सा होता है जिसमें हम दिन में सपने देखते हैं, यह यादाश्त कायम रखने के लिहाज से बेहद अहम होता है.
मतलब कोई नई भाषा सीखना या कोई नई कला सीख कर आप अपने दिमाग़ की क्षमता बढ़ा सकते हैं.
ये सब नहीं कर पाएं तो अपने दोस्तों और परिवार के सदस्यों के साथ ऑनलाइन गेम ही खेलकर देखिए.
किसी को गाने सुनते हुए देखिए या कोई वाद्ययंत्र बजाते हुए देखिए, आपको लगेगा कि उसका पूरा शरीर एक्टिव है.
कई बार यादाश्त चले जाने के मामलों में भी म्यूज़िक से फ़ायदा देखा गया है.
अगर आप दिन में कुछ नया पढ़ते हैं तो आपके दिमाग़ के दो कोशिकाओं के तार जुड़ जाते हैं, जब आप सोते हैं जो ये संपर्क मज़बूत होता है और आपने जो भी पढ़ा, वो आपकी यादाश्त में शामिल हो जाता है.
इसलिए नींद यादाश्त के लिए सबसे अहम फैक्टर होता है.
यही वजह है कि सोने से पहले फ़िल्म देखने या डरावनी कहानी देखने से बचना चाहिए. पाजिटिव अनुभवों के साथ सोना चाहिए.
तो आप ये जान ही चुके हैं कि नींद बहुत अहम है, अगर आप पांच घंटे से कम सोते हैं तो आप मानसिक रूप से उतने एलर्ट नहीं हो सकते. यही स्थिति तब भी हो सकती है जब आप 10 घंटे से ज़्यादा सोते हैं.
बहरहाल आप कैसे उठते हैं ये भी महत्वपूर्ण है.
सबसे अच्छी स्थिति तो ये है कि आप अंधेरे में सोएं और धीरे धीरे तेज़ हो रही रोशनी में उठें, जैसे सूर्य की रोशनी. ये रोशनी आपकी पलकों से होते हुए जब गुजरती है तो दिमाग़ को बेहतर रिस्पांस के लिए तैयार करती है.
घर में सूर्य की रोशनी नहीं आ रही हो तो ऐसा अलार्म ख़रीदइए जिसमें लाइट सिस्टम लगा हो. न आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने एक सितंबर से सिगरेट के पैकेट पर एक हेल्पलाइन नंबर लिखने का फ़ैसला किया है. ये नंबर है: 1800-11-2356.
भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश के मुताबिक अगले महीने से सिगरेट के पैकेट पर लिखा होगा - आज ही छोड़ें, कॉल करें 1800-11-2356.
नए पैकेट में चित्र और चेतावनी दोनों ही बदली होगी. हेल्पलाइन नम्बर के साथ पैकेट पर 'तंबाकू से कैंसर होता है' या फिर 'तंबाकू से दर्दनाक मौत होती है' लिखा होना भी जरूरी होगा.
वैसे तो ये सेवा केन्द्र 2016 से दिल्ली में चल रहा है. हेल्पलाइन पर फोन करते ही सबसे पहले रिकॉर्डेड आवाज़ आती है - हम आपके तंबाकू छोड़ने के फ़ैसले का स्वागत करते हैं. हमारे काउंसलर जल्द ही आपसे बात करेंगे.
कई बार काउंसलर व्यस्त होने की वजह से बात नहीं करते और फोन कट जाता है.
इस हेल्पलाइन पर तीन बार फोन करने के असफल प्रयास के बाद काउंसलर के पास हमारा नम्बर भी लगा. फ़ोन पर एक महिला की आवाज़ सुन कर वो थोड़ा हैरान थी.
काउंसलर से जब उनकी हैरानी का सबब पूछा तो उन्होंने खुद बताया कि देश में केवल तीन फ़ीसदी महिलाएं ही तंबाकू का सेवन करती हैं.
सिगरेट छोड़ने के हेल्पलाइन नंबर पर फ़ोन करने वाले ज़्यादातर पुरूष होते हैं. महिलाएं फ़ोन करती भी हैं तो अपने पति-भाई या दूसरे सगे संबंधियों के लिए करती हैं.
फिर शुरू हुआ बातचीत का सिलसिला.

Friday, August 31, 2018

एशियन गेम्स 2018: स्वप्ना और अरपिंदर सिंह ने भारत को दिलाया गोल्ड

जकार्ता में चल रहे एशियन गेम्स में भारत की स्वप्ना बर्मन ने गोल्ड जीतकर नया इतिहास रचा है.
एथियन गेम्स के हेप्टाथलॉन में पहली बार भारत को गोल्ड मिला है.
इसके अलावा भारत के अरपिंदर सिंह ने पुरुषों के ट्रिपल जंप में गोल्ड जीता है.
48 वर्षों में पहली बार किसी भारतीय ने ट्रिपल जंप में गोल्ड जीता है.
इसके साथ ही इस एशियन गेम्स में भारत के पदकों की कुल संख्या 54 हो गई है. इनमें 11 गोल्ड, 20 सिल्वर और 23 ब्रॉन्ज़ मेडल हैं.
गोल्ड मेडल जीतने के क्रम में स्वप्ना ने हाई जंप और जेवलिन थ्रो में जीत हासिल की. शॉट पुट और लॉन्ग जंप में उन्होंने दूसरा स्थान हासिल किया.
उनका सबसे कमज़ोर प्रदर्शन 100 मीटर में रहा, जहाँ वे पाँचवें स्थान पर रहीं, जबकि 200 मीटर में उन्होंने सातवाँ स्थान हासिल किया.
गोल्ड हासिल करने के लिए स्वप्ना को 800 मीटर की दौड़ में अच्छा प्रदर्शन करना था, वो इस दौड़ में चौथे स्थान पर रहीं.
पिछले साल भुवनेश्वर में एशियन एथलेटिक्स चैम्पियनशिप के दौरान स्वप्ना गिर गईं थी. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.
दूसरी ओर अरपिंदर सिंह ने ट्रिपल जंप में भारत को गोल्ड दिलाया.
उन्होंने 16.77 मीटर की छलांग लगाई.
अरपिंदर को कई प्रतियोगिताओं में बिना मेडल के ही रहना पड़ा था, जबकि 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने कांस्य पदक जीता था.
भारत को 1970 में ट्रिपल जंप में गोल्ड मेडल मिला था और ये पदक दिलाया था मोहिंदर सिंह गिल ने.
किसी भी खिलाड़ी की महानता को नापने का सबसे बड़ा पैमाना है कि उसके साथ कितनी किंवदंतियाँ जुड़ी हैं. उस हिसाब से तो मेजर ध्यानचंद का कोई जवाब नहीं है.
हॉलैंड में लोगों ने उनकी हॉकी स्टिक तुड़वा कर देखी कि कहीं उसमें चुंबक तो नहीं लगा है. जापान के लोगों को अंदेशा था कि उन्होंने अपनी स्टिक में गोंद लगा रखी है.
हो सकता है कि इनमें से कुछ बातें बढ़ा चढ़ा कर कही गई हों लेकिन अपने ज़माने में इस खिलाड़ी ने किस हद तक अपना लोहा मनवाया होगा इसका अंदाज़ा
दो बार के ओलंपिक चैंपियन केशव दत्त ने हमें बताया कि बहुत से लोग उनकी मज़बूत कलाईयों ओर ड्रिब्लिंग के कायल थे. "लेकिन उनकी असली प्रतिभा उनके दिमाग़ में थी. वो उस ढंग से हॉकी के मैदान को देख सकते थे जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है. उनको बिना देखे ही पता होता था कि मैदान के किस हिस्से में उनकी टीम के खिलाड़ी और प्रतिद्वंदी मूव कर रहे हैं."
याद कीजिए 1986 के विश्व कप फुटबॉल का फ़ाइनल. माराडोना ने बिल्कुल ब्लाइंड एंगिल से बिना आगे देख पाए तीस गज़ लंबा पास दिया था जिस पर बुरुचागा ने विजयी गोल दागा था.
किसी खिलाड़ी की संपूर्णता का अंदाज़ा इसी बात से होता है कि वो आँखों पर पट्टी बाँध कर भी मैदान की ज्योमेट्री पर महारत हासिल कर पाए.
केशव दत्त कहते हैं, "जब हर कोई सोचता था कि ध्यानचंद शॉट लेने जा रहे हैं वो गेंद को पास कर देते थे. इसलिए नहीं कि वो स्वार्थी नहीं थे (जो कि वो नहीं थे) बल्कि इसलिए कि विरोधी उनके इस मूव पर हतप्रभ रह जाएं. जब वो इस तरह का पास आपको देते थे तो ज़ाहिर है आप उसे हर हाल में गोल में डालना चाहते थे."के पूर्वी अफ़्रीका के दौरे के दौरान उन्होंने केडी सिंह बाबू को गेंद पास करने के बाद अपने ही गोल की तरफ़ अपना मुंह मोड़ लिया और बाबू की तरफ़ देखा तक नहीं.
जब उनसे बाद में उनकी इस अजीब सी हरकत का कारण पूछा गया तो उनका जवाब था, "अगर उस पास पर भी बाबू गोल नहीं मार पाते तो उन्हें मेरी टीम में रहने का कोई हक़ नहीं था."
1968 में भारतीय ओलंपिक टीम के कप्तान रहे गुरुबख़्श सिंह ने मुझे बताया कि 1959 में भी जब ध्यानचंद 54 साल के हो चले थे भारतीय हॉकी टीम का कोई भी खिलाड़ी बुली में उनसे गेंद नहीं छीन सकता था.
ध्यान चंद अपनी आत्मकथा 'गोल' में लिखते हैं, "मैं जब तक जीवित रहूँगा इस हार को कभी नहीं भूलूंगा. इस हार ने हमें इतना हिला कर रख दिया कि हम पूरी रात सो नहीं पाए. हमने तय किया कि इनसाइड राइट पर खेलने के लिए आईएनएस दारा को तुरंत भारत से हवाई जहाज़ से बर्लिन बुलाया जाए."
दारा सेमी फ़ाइनल मैच तक ही बर्लिन पहुँच पाए.
जर्मनी के ख़िलाफ फ़ाइनल मैच 14 अगस्त 1936 को खेला जाना था. लेकिन उस दिन बहुत बारिश हो गई.
इसलिए मैच अगले दिन यानि 15 अगस्त को खेला गया. मैच से पहले मैनेजर पंकज गुप्ता ने अचानक कांग्रेस का झंडा निकाला.
उसे सभी खिलाड़ियों ने सेल्यूट किया (उस समय तक भारत का अपना कोई झंडा नहीं था. वो गुलाम देश था इसलिए यूनियन जैक के तले ओलंपिक खेलों में भाग ले रहा था.)
बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उस दिन 40,000 लोग फ़ाइनल देखने के लिए मौजूद थे.
देखने वालों में बड़ौदा के महाराजा और भोपाल की बेगम के साथ साथ जर्मन नेतृत्व के चोटी के लोग मौजूद थे.
ताज्जुब ये था कि जर्मन खिलाड़ियों ने भारत की तरह छोटे छोटे पासों से खेलने की तकनीक अपना रखी थी. हाफ़ टाइम तक भारत सिर्फ़ एक गोल से आगे था.
इसके बाद ध्यान चंद ने अपने स्पाइक वाले जूते और मोज़े उतारे और नंगे पांव खेलने लगे. इसके बाद तो गोलों की झड़ी लग गई.
इस बात से लगाया जा सकता है कि वियना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है जिसमें उनके चार हाथ और उनमें चार स्टिकें दिखाई गई हैं, मानों कि वो कोई देवता हों.
'एक आंख, एक पैर' से ठसक जमाने वाला टाइगर
1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके साथ खेले और बाद में पाकिस्तान के कप्तान बने आईएनएस दारा ने वर्ल्ड हॉकी मैगज़ीन के एक अंक में लिखा था, "ध्यान के पास कभी भी तेज़ गति नहीं थी बल्कि वो धीमा ही दौड़ते थे. लेकिन उनके पास गैप को पहचानने की गज़ब की क्षमता थी. बाएं फ्लैंक में उनके भाई रूप सिंह और दाएं फ़्लैंक में मुझे उनके बॉल डिस्ट्रीब्यूशन का बहुत फ़ायदा मिला. डी में घुसने के बाद वो इतनी तेज़ी और ताकत से शॉट लगाते थे कि दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन गोलकीपर के लिए भी कोई मौका नहीं रहता था."
दारा ने बाद में लिखा, "छह गोल खाने के बाद जर्मन रफ़ हॉकी खेलने लगे. उनके गोलकीपर की हॉकी ध्यान चंद के मुँह पर इतनी ज़ोर से लगी कि उनका दांत टूट गया."
"उपचार के बाद मैदान में वापस आने के बाद ध्यान चंद ने खिलाड़ियों को निर्देश दिए कि अब कोई गोल न मारा जाए. सिर्फ़ जर्मन खिलाड़ियों को ये दिखाया जाए कि गेंद पर नियंत्रण कैसे किया जाता है."
"इसके बाद हम बार बार गेंद को जर्मन डी में ले कर जाते और फिर गेंद को बैक पास कर देते. जर्मन खिलाड़ियों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है."
भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया और इसमें तीन गोल ध्यान चंद ने किए.
एक अख़बार मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा, "बर्लिन लंबे समय तक भारतीय टीम को याद रखेगा. भारतीय टीम ने इस तरह की हॉकी खेली मानो वो स्केटिंग रिंक पर दौड़ रहे हों. उनके स्टिक वर्क ने जर्मन टीम को अभिभूत कर दिया."
ध्यानचंद के पुत्र और 1972 के म्यूनिख ओलंपिक खेलो में कांस्य पदक विजेता अशोक कुमार बताते हैं कि एक बार उनकी टीम म्यूनिख में अभ्यास कर रही थी तभी उन्होंने देखा कि एक बुज़ुर्ग से शख़्स एक व्हील चेयर पर बैठे चले आ रहे हैं.
उन्होंने पूछा कि इस टीम में अशोक कुमार कौन हैं.
जब मुझे उनके पास ले जाया गया तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया और भावपूर्ण ढ़ंग से अपनी टूटी फूटी अंग्रेज़ी में बताने लगे... तुम्हारे पिता इतने महान खिलाड़ी थे. उनके हाथ में 1936 के ख़बरों की पीली हो चुकी कतरनें थी जिसमें मेरे पिता के खेल का गुणगान किया गया था.
ओलंपियन नंदी सिंह ने एक बार बीबीसी को बताया था कि लोगों में ये बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है कि ध्यान चंद बहुत ड्रिबलिंग किया करते थे.
वो बिल्कुल भी ड्रिबलिंग नहीं करते थे. गेंद को वो अपने पास रखते ही नहीं थे. गेंद आते ही वो उसे अपने साथी खिलाड़ी को पास कर देते थे.
हाफ़ टाइम तक कोई गोल नहीं हो पाया. सहगल ने कहा कि हमने दोनों भाइयों का बहुत नाम सुना है.
मुझे ताज्जुब है कि आप में से कोई आधे समय तक एक गोल भी नहीं कर पाया.
रूप सिंह ने तब सहगल से पूछा कि क्या हम जितने गोल मारे उतने गाने हमें आप सुनाएंगे?

Friday, August 17, 2018

重新审视所谓“中国水危机”

近来有分析认为,水资源短缺问题正威胁着中国的经济安全,一场危机正在逼近。事实上,关于水危机的声音似乎一直未曾消散,对中国当局而言尤其如此。

中国的水供应和管理确实问题不小,但深入观察华北的情况,你会发现这些关于危机和短缺的表述存在一些问题。我们(墨尔本大学)和一些同行对中国南水北调工程的管理和影响进行了合作研究,发现中国的经济发展目前没有受到水资源供应短缺的威胁,且在不久的将来也不太可能受到威胁。

危机并非迫在眉睫

类似法尔肯马克指数()这样的对水资源稀缺性进行广泛评估的方法往往被不加甄别地应用于中国,并成为中国广泛存在用水压力的证据。该指数衡量的是一个地区的人均淡水占有量——主要是降水和河流流量。虽然华北的数值肯定低于西欧和北美,但这本身并不是一个问题。

首先,民众对饮用水的需求要远低于许多发达国家。原因在于中国有很大一部分人口生活在楼房里,没有自己的园子,多数农村家庭又不使用抽水马桶。在墨尔本这样的城市,高达35%的家庭用水不是用于浇灌园子,就是冲厕所,或者就是漏掉了。事实上,北京居民每年的平均用水量比墨尔本少50%到75%。

其次,法尔肯马克指数没有考虑到从水库、河流或者地下抽取的水资源使用过后并不会就此消失这一事实。大部分的水都可以重复利用。事实上目前北京四分之一的水都是再循环水,从水量上来说,仅略少于南水北调工程的长江引水量。再循环水供给的增加,以及南水北调工程似乎使北京地下水水位有所回升(地下水水位下降往往被认为是北京面临水危机的证明)。官方数据显示,北京的地下水水位自2010年起一直保持稳定,并在2015和2016年略有上升。

此外,北京如果真的面临巨大的用水压力,2016年就不可能在公园绿地和环境流量方面使用超过10亿立方米的水。同样,北京官方的用水量数据显示,生态用水是该市用量增长最快的一类水资源。

需求重于供应,质量重于数量

虽然这场危机可能被夸大了,但我们并不认为华北的水供应没有问题。但正如关于水供应的争论常常提到的那样,问题更多的在于对需求进行管理,而不是无限扩大供应。

中国尽管仍在建设大型的供水设施,但也越来越重视对需求的管理。从历史上来看,中国几乎没有提高用水效率的激励机制,但京津冀地区正在试点合同节水管理的新举措,未来几年该项目全国试点将增加至100个。

以市场为导向的水分配机制也在崛起。中国水权交易所于2016年年中正式启动,其目的是促进区域和各部门之间水权的交易。国家水权交易试点取得的经验也成为进一步建立有益于水权交易市场发展的法律、政策和治理基础设施的借鉴。

中国似乎也在通过连接水基础设施来管理用水需求。除了拓展南水北调工程,我们还发现有上百个小型水利基础设施项目(水库和运河)正在建设中,其目的是在增加供水的同时,把(天然和人工)水系联系起来,以便将水调到需要的或者能得到最有效利用的地方。这个有形的基础设施网络可以和水权交易一起可以被理解为国家供水网的雏形。

中国的水资源问题很大程度上是由广泛的水污染造成的。但我们有理由对中国解决水污染问题持乐观态度。2014年,总理李克强宣布拨款2万亿元人民币治理水污染问题,并列出了水资源管理三条红线。2015年4月,国务院出台“水污染防治行动计划”,并在全国范围内推行河长制度。2018年3月的行政改革应进一步加强这些污染治理工作的力度。

华北全速前进

如果说水资源确实是华北经济发展的一个制约因素,那么水供应就应当是地方产业主要担心的问题,也就不太可能有类似通过雄安新区的建设进一步带动京津冀地区经济的计划。

北京的行业用户似乎对水资源的关注很少。最近我们采访了15家公司,只有一家公司提到了对用水的限制,而这个限制因素是价格。该公司所在行业特殊,每立方米的水费是160元,相比之下城市里的制造企业所需支付的水费只有9.5元(执行特殊水价的行业包括:洗车业、洗浴业、纯净水业、高尔夫球场和滑雪场)。此外,行业用水配额的计算是以历史用水量为基础的。公司若想提高产量,就必须申请增加配额。但除此之外,水资源的供应和消耗都属于日常惯例。

雄安新区的建设继续快速推进:新城将承接北京的非首都功能,预计需要300到500万的劳动人口。对水资源、土地和人口承载力的评估已经完成,而这个“千年大计”并没有因此暂停。

按设想,雄安新区将成为一个生态城市,主要采用可再生能源,并且汇集各种高科技和低污染行业。新区的建设已经得到了南水北调工程中线的支持,并从黄河引水补给中国北方最大的淡水湖白洋淀。

总体来说,华北需要的不是更多水,而是更好地管理其所拥有的水资源,这包括加强污染防治和提高用水效率。有迹象表明,这两方面都有所进展。

未来几年,中国的饮用水量预计将不降反增,而且为满足(甚至提高)用水需求,中国还将继续通过扩大流域间调水工程、新建供水基础设施和水权交易平台等渠道调水。随着一张几乎覆盖全国的水网铺陈开来,水供应将不会成为制约中国发展的主要因素。


感谢以下项目合作者的协助:江旻、史晨辰、张文静、迈克尔·韦伯(Michael Webber)、布莱恩·芬利森(Brian Finlayson)、伊恩·拉瑟福德()、约翰·巴奈特(Jon Barnett)、马克·王(Mark Wang)、江红(墨尔本大学)以及布雷特·克劳-米勒(Britt Crow-Miller)(亚利桑那州立大学)和陈丹(河海大学)。

Tuesday, August 14, 2018

ब्लॉग: क्या महिलाएं कभी कह पाएंगी, हां आज़ाद हूं मैं

आज सुबह अख़बार हाथ में लेते ही भोपाल से लेकर बिहार तक हो रहे बलात्कारों की ख़बरों पर नज़र पड़ी. उदास होकर अख़बार मेज़ पर रखने ही वाली थी कि नज़र अखबार के ऊपर पर छपी तारीख़ पर गई - 14 अगस्त 2018.
बुधवार को भारत आज़ादी की 72वीं सालगिरह मना रहा है. यूं तो सृष्टि के विशाल इतिहास में 72 साल वक़्त की आंख से छलके एक आंसू जितना छोटा अरसा है, लेकिन फिर भी बाहर गिरती बारिश में डूबते मेरे मन में एक सवाल उठा- 72 साल के इस युवा आज़ाद देश में आखिर कितनी आज़ाद हैं हम महिलाएं?
आज़ाद भारत में बड़ी हुई एक भारतीय लड़की होने की वजह से इस सवाल के जवाब का एक स्वरूप मैं अपने दिल में जानती हूं और हर रोज़ सड़कों पर चलते हुए महसूस भी करती हूं. लेकिन फिर भी इस सवाल के ताज़ा आकड़ों से लेकर इतिहास के पन्नों में दर्ज जवाबों को टटोलने के लिए मैंने इंटरनेट और किताबों को खंगालना शुरू किया.
जानना यह था कि जिस 'आधी आबादी' का आवाहन महात्मा गाँधी ने स्वतंत्रा आंदोलन के दौरान 'भारत की अप्रयुक्त शक्ति' के तौर पर किया था, क्या आज उस आधी आबादी को अपनी क्षमताओं का पूरा दोहन करने का अवसर मिल रहा है?
समाज और कई बार अपनी ही संविधान सभा के सदस्यों से लड़कर भारत के जिस संविधान में बाबा साहब आम्बेडकर ने हमारे आज़ाद और स्वावलंबी भविष्य के बीज बोये थे, आज वह क़ानून हमें हमारे जीवन पर कितना अधिकार दिला पाते हैं?
सिर्फ़ दो प्रतिशत महिलाओं के साथ शुरू हुई भारत की पहली संसद की यात्रा आज कितनी आगे पहुंची है? इन सवालों के जवाब में मुझे मिला आंकड़ों का एक पुलिंदा और इस देश में स्त्री सशक्तीकरण के लिए समय-समय पर बनाए क़ानूनों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त. इनमें से कुछ मह्त्वपूर्ण जानकारियों को मैं आपके साथ आगे साझा भी करूंगी पर उससे पहले आइए मिलते हैं सुगंधा से.
सुगंधा मध्यप्रदेश के बेतूल या महाराष्ट्र के बीड ज़िले में या कहीं और रहने वाली कोई भी लड़की हो सकती है. ठीक इसी तरह वह मुंबई और दिल्ली जैसे भारत के महानगरों में बसने वाली कोई लड़की भी हो सकती है. सुगंधा अपनी आँखों में सपने लिए हर रोज़ अपने गांव या शहर की सड़कों पर निकलना चाहती है. वह पढ़ने जाना चाहती है. कभी खेतों तो कभी फ़ैक्ट्रियों में काम करने जाना चाहती है. अपने काम में वह एक पद के लिए सामान वेतन चाहती है.
वह शारीरिक पोषण और मानसिक विकास के समान अवसर चाहती है. सड़कों पर देर रात फिरना चाहती है. दिल होने पर बेख़ौफ़ होकर गहरे गले का ब्लाउज़ पहनना चाहती है. वह प्रेम का निवेदन पहले करना चाहती है. सुगंधा की आत्मा जब उसके दिल और मर्ज़ी की थाप पर एक साथ गुनगुनाती है, तब वह निर्भय होकर शारीरिक प्रेम करना चाहती है. उसे 'देवी' और 'स्त्री की गरिमा' के नाम पर अपने ऊपर थोपे गए समाज के तमाम नैतिक निर्णयों पर कभी हंसी आती है तो कभी गुस्सा.
स्त्री की गरिमा किसी दूसरे मनुष्य की मानवीय गरिमा से अलग कैसे? जाति और धर्म के 'सम्मान' के नाम पर मारे जा रहे प्रेमियों के युग में सुगंधा अपनी मर्ज़ी से अपना साथी चुनने का अधिकार भी चाहती है. दिल चाहे तो वह बुर्क़ा पहनना चाहती है और मन करे तो बिकनी भी. उसकी मर्ज़ी हो तब लाल लिपस्टिक लगाने का अधिकार चाहती है और मर्ज़ी हो तो बिना मेकअप फिरने का हक़. शादी करने न करने के साथ-साथ बच्चे पैदा करने और माँ न बनने में से अपने लिए ख़ुद चुनने का अधिकार. किसी भी तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने का अधिकार. उसे अपने लिए चुनने का अधिकार चाहिए.
बस, यहीं पर यह बात साफ़ हो जाती है कि क़ागज़ी क़ानूनों और ज़मीनी सच्चाई के बीच उतनी ही दूरी होती है जितनी एक हाथ से फिसलते चाय के प्याले और होठों के बीच. चाय पीने, क़ानूनों के काम करने और अधिकारों के मिल जाने का भ्रम तो बना रहता है, पर ज़मीन पर असल तस्वीर जस की तस रहती है.
सबसे ताज़ा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में हर रोज़ 106 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं. इन 106 में कम से कम 40 प्रतिशत पीड़ित नाबालिग लड़कियां हैं. आंकड़ों की यह स्थिति तब है जब 99 प्रतिशत यौन हिंसा के मामले दर्ज होने के लिए थाने तक पहुंच ही नहीं पाते हैं.
एक ओर जहां महिला आरक्षण बिल दशकों से अधर में लटका हुआ है, वहीं दूसरी ओर 2018 के आर्थिक सर्वेक्षण में पाया गया कि देश की कुल जनसंख्या का 49 प्रतिशत बनाने वाली भारतीय महिलाओं का संसद और अन्य ज़रूरी सरकारी पदों पर प्रतिनिधत्व बहुत कम है.
आज जहां देश के लगभग 85 प्रतिशत पुरुष शिक्षित हैं, वहीं 65 प्रतिशत लड़कियां ही साक्षर हो पाई हैं. यह बात और है कि एक अदद मौका मिलने पर लड़कियां हर तरह की राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार अपना परचम लहरा कर ख़ुद को साबित कर रही हैं. पर शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकता से ही वंचित देश की हज़ारों लड़कियों के लिए रेस की शुरूआती लकीर औरों से पीछे खिंच जाती है.
भारतीय रोज़गार के बाज़ार में औरतों की सिर्फ़ 25 प्रतिशत हिस्सेदारी भी ऊपर लिखे आंकड़ों का प्रतिबिम्ब जान पड़ती है. एक रिपोर्ट का दावा है कि महिलाओं की रोज़गार में हिस्सेदारी सिर्फ़ 10 फ़ीसदी बढ़ाने से भारत के सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी में 70 प्रतिशत का उछाल आ सकता है.
अपने शहर के मुख्य चौराहे पर लहरा रहे तिरंगे को देखते हुए आज सुगंधा इन्ही आकंड़ों के बारे में सोच रही है. उसे लगता है कि आज़ादी के 71 सालों में वह शायद इतना ही आगे बढ़ पाई है...जितना कोई और 78 दिनों या 78 महीनों में बढ़ सकता है. उसे अभी बहुत आगे जाना है...एक ऐसे भारत में अपनी आंखें खोलनी हैं जहां वह निडर होकर बस 'जी' सके और एक दिन...शायद हमारे 178वें स्वतंत्रता दिवस पर आप सबसे कह सके - 'आज़ादी मुबारक, दोस्तों'.